Friday, July 22, 2016

मृत्यु



मृत्यु एक शाश्वत सत्य है, इसे न टाला जा सकता है और न ही बदला जा सकता है। किसी की मृत्यु के पीछे जो इश्वर का उदेश्य होता है हम उसे कभी नहीं समझ सकते, क्योंकि हमारी चेतना अभी इतनी प्रबल नहीं है कि हम ईश्वर की करनी को समझ सकें। वो ईश्वर है, सबसे बड़ा है, उसकी हर अच्छी और बुरी करनी के पीछे एक उदेश्य छिपा होता है जो हम तुच्छ प्राणीयों की कल्पना से भी परे है। (दिया हुआ चित्र इसी बात की पुष्टि करता है)

‪#‎गीता में लिखा है :- मनुष्य जैसे पुराने वस्त्रों को छोड़कर नये वस्त्र धारण कर लेता है वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर दूसरे नये शरीर में चली जाती है। तेइसवें श्लोक में बताया गया है कि शस्त्र इस आत्मा को काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती अर्थात् प्रत्येक स्थिति में यह आत्मा अपरिवर्तनीय रहती है। सत्ताइसवें श्लोक का अर्थ है कि पैदा हुए मनुष्य की मृत्यु अवश्य होगी और मरे हुए मनुष्य का जन्म अवश्य ही होगा। इस जन्म व मरण रूपी परिवर्तन के प्रवाह का निवारण नहीं हो सकता। अतः जन्म व मृत्यु होने पर मनुष्य को हर्ष व शोक नहीं करना चाहिये।

‪#‎कुरान में लिखा है:- (42) और जो लोग आस्थावान हुए और उन्होंने भले कर्म किये, हम किसी व्यक्ति पर उसकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालते हैं, यही लोग जन्नत वाले हैं वह उसमे सदैव रहेंगे। (43) और उनके सीने की प्रत्येक खटक को हम निकल देंगे। उनके नीचे नहरे बह रही होंगी और वह कहेंगे कि सम्पूर्ण प्रसंशा अल्लाह के लिए है जिसने हमको यहाँ तक पहुँचाया और हम मार्ग पाने वाले न थे यदि अल्लाह हमारा मार्गदर्शन न करता। हमारे पालनहार के संदेष्टा सच्ची बात लेकर आये थे। और पुकारा जायेगा की यह जन्नत है जिसके तुम उत्तराधिकारी घोषित किये गये हो अपने कर्मो के बदले। (सूरह अल-आराफ़)

‪#‎विज्ञान के अनुसार:- समानांतर ब्रह्माण्ड यानि संभावनाओं के असंख्य ब्रह्माण्ड, जितनी संभावनाएं उतने ही ब्रह्माण्ड। इसके आधार पर हम कह सकते हैं कि इस बात की भी सम्भावना है कि हमारे ब्रह्माण्ड के समानांतर एक ऐसा ब्रह्माण्ड भी हो सकता है जिसमे वह व्यक्ति जिन्दा हो और अपना जीवन व्यतीत कर रहा हो और हम सब उसके साथ घूम रहे हो व हंसी-मजाक कर रहे हो, इस बात से बिलकुल बेखबर की हमारे जैसे एक समानांतर ब्रह्माण्ड में उसकी मृत्यु हो चुकी है।

इन सब बातों को पढ़ कर बस इतना ही समझ आया है कि कोई भी प्राणी पूर्ण रूप से लुप्त नही होता, वह कहीं-न-कहीं होता जरूर हैं। और सच भी है, कोई मृत्यु को प्राप्त होने के पश्चात भी हमारे हृदय में, हमारे मस्तिष्क, हमारी स्मृति में, हमारे बीते हुए कल में वो व्यक्ति हमारे साथ ही होता है।

आज की बात मैं समर्पित करता हूँ उसे जो आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन हमारे हृदय और मस्तिष्क से उसकी स्मृति कभी लुप्त नहीं हो सकती। बेशक हम उन्हें न कुच्छ दे सकते हैं और न ही उनके लिए कुच्छ कर सकते हैं पर हम उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना जरूर कर सकते हैं कि ईश्वर उनकी आत्मा को शांति और मोक्ष प्रदान करे और साथ ही ईश्वर हर उस प्राणी को शांति व मोक्ष प्रदान करे जो मृत्यु को प्राप्त हुआ है और उनके परिवार वालो और अपनों को इस दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करे।