Wednesday, September 13, 2017

पलकों में हमे भी कहीं तुम


पलकों में हमे भी कहीं तुम, छुपा लिया करो
वक़्त-बे-वक़्त कभी हमें भी, चाह लिया करो
माना के गर्दिशें लाख सही जमाने की मगर
निकाल कर वक़्त थोड़ा, मुस्कुरा लिया करो
ये मौसम जो गुजरा, लौट कर फिर नहीं आएगा
इस मौसम का लुत्फ भी कभी, उठा लिया करो
ये दिललगी है अगर तो दिललगी ही सही
इस दिललगी मे भी कभी दिल, लगा लिया करो

Friday, July 22, 2016

मृत्यु



मृत्यु एक शाश्वत सत्य है, इसे न टाला जा सकता है और न ही बदला जा सकता है। किसी की मृत्यु के पीछे जो इश्वर का उदेश्य होता है हम उसे कभी नहीं समझ सकते, क्योंकि हमारी चेतना अभी इतनी प्रबल नहीं है कि हम ईश्वर की करनी को समझ सकें। वो ईश्वर है, सबसे बड़ा है, उसकी हर अच्छी और बुरी करनी के पीछे एक उदेश्य छिपा होता है जो हम तुच्छ प्राणीयों की कल्पना से भी परे है। (दिया हुआ चित्र इसी बात की पुष्टि करता है)

‪#‎गीता में लिखा है :- मनुष्य जैसे पुराने वस्त्रों को छोड़कर नये वस्त्र धारण कर लेता है वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर दूसरे नये शरीर में चली जाती है। तेइसवें श्लोक में बताया गया है कि शस्त्र इस आत्मा को काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती अर्थात् प्रत्येक स्थिति में यह आत्मा अपरिवर्तनीय रहती है। सत्ताइसवें श्लोक का अर्थ है कि पैदा हुए मनुष्य की मृत्यु अवश्य होगी और मरे हुए मनुष्य का जन्म अवश्य ही होगा। इस जन्म व मरण रूपी परिवर्तन के प्रवाह का निवारण नहीं हो सकता। अतः जन्म व मृत्यु होने पर मनुष्य को हर्ष व शोक नहीं करना चाहिये।

‪#‎कुरान में लिखा है:- (42) और जो लोग आस्थावान हुए और उन्होंने भले कर्म किये, हम किसी व्यक्ति पर उसकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालते हैं, यही लोग जन्नत वाले हैं वह उसमे सदैव रहेंगे। (43) और उनके सीने की प्रत्येक खटक को हम निकल देंगे। उनके नीचे नहरे बह रही होंगी और वह कहेंगे कि सम्पूर्ण प्रसंशा अल्लाह के लिए है जिसने हमको यहाँ तक पहुँचाया और हम मार्ग पाने वाले न थे यदि अल्लाह हमारा मार्गदर्शन न करता। हमारे पालनहार के संदेष्टा सच्ची बात लेकर आये थे। और पुकारा जायेगा की यह जन्नत है जिसके तुम उत्तराधिकारी घोषित किये गये हो अपने कर्मो के बदले। (सूरह अल-आराफ़)

‪#‎विज्ञान के अनुसार:- समानांतर ब्रह्माण्ड यानि संभावनाओं के असंख्य ब्रह्माण्ड, जितनी संभावनाएं उतने ही ब्रह्माण्ड। इसके आधार पर हम कह सकते हैं कि इस बात की भी सम्भावना है कि हमारे ब्रह्माण्ड के समानांतर एक ऐसा ब्रह्माण्ड भी हो सकता है जिसमे वह व्यक्ति जिन्दा हो और अपना जीवन व्यतीत कर रहा हो और हम सब उसके साथ घूम रहे हो व हंसी-मजाक कर रहे हो, इस बात से बिलकुल बेखबर की हमारे जैसे एक समानांतर ब्रह्माण्ड में उसकी मृत्यु हो चुकी है।

इन सब बातों को पढ़ कर बस इतना ही समझ आया है कि कोई भी प्राणी पूर्ण रूप से लुप्त नही होता, वह कहीं-न-कहीं होता जरूर हैं। और सच भी है, कोई मृत्यु को प्राप्त होने के पश्चात भी हमारे हृदय में, हमारे मस्तिष्क, हमारी स्मृति में, हमारे बीते हुए कल में वो व्यक्ति हमारे साथ ही होता है।

आज की बात मैं समर्पित करता हूँ उसे जो आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन हमारे हृदय और मस्तिष्क से उसकी स्मृति कभी लुप्त नहीं हो सकती। बेशक हम उन्हें न कुच्छ दे सकते हैं और न ही उनके लिए कुच्छ कर सकते हैं पर हम उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना जरूर कर सकते हैं कि ईश्वर उनकी आत्मा को शांति और मोक्ष प्रदान करे और साथ ही ईश्वर हर उस प्राणी को शांति व मोक्ष प्रदान करे जो मृत्यु को प्राप्त हुआ है और उनके परिवार वालो और अपनों को इस दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करे।

Wednesday, December 9, 2015

वक्त की बारिश में

वक्त की बारिश में सबको फिसलते देखा है
जो अपने थे उन सबको धीरे धीरे बदलते देखा है।।
वादा किया था सबने हर वक्त साथ निभाने का,
मैने उन सब वादो को भी पिघलते देखा है।।

जरूरत के तराजू में जब भी किसी दोस्त ने हमें तोला,
दिल निकाल कर रख दिया और मुह से कुछ ना बोला
पर जब किसी की दोस्ती मेरे लिए जरूरी थी,
तो पता लगा उनकी अपनी कोई मजबूरी थी।।

Tuesday, August 25, 2015

सोच रहा हूँ की मोहब्बत

सोच रहा हूँ की मोहब्बत के कुछ राज़ लिखू,
कुछ अनसुलझे सवालो के जवाब लिखू।
ये दिल करता है अब भी वकालत उस बेवफा की,
सोच रहा हूँ, आज कुछ दिल के खिलाफ लिखू। 
रो पड़ती है अक्सर ये कलम भी दास्ताँ-ऐ-दिल लिखते हुए,
कैसे मैं मोहब्बत के वो जज्बात लिखू। 
वक़्त की बारिस से धुल जाती है वो मोहब्बत की यादें,
कैसे मैं अपनी दास्ताँ-ऐ-मोहब्बत की किताब लिखू। 

Thursday, May 14, 2015

कभी रुके हम



कभी रुके हम मोहब्बत में तो कभी चलते गए।
बस इस तरह हम अपनी मंजिल बदलते गए।
कई बार देखा है हमने तनहाईयों का मंजर,
टूट कर फिर भी हर बार हम संभलते गए।
अब भी बसी हैं दिल में वो मोहब्बत की यादें,
धीरे धीरे से ही पर जिन्हें हम भूलते गए।

Friday, April 24, 2015

जिंदगी एक संघर्ष

मैंने अपना वजन किया, मसीन से उतरने के बाद मैंने उस बच्चे को 2 रूपये दिए और जैसे ही पलट कर जाने लगा अचानक वो बच्चा बोला।
भैया आप रोज़ अपना वजन क्यों करते हो ?

मैंने कहा - बस ऐसे ही, मैं अपना वजन बढ़ा रहा हूँ ना इसलिए, रोज़ रोज़ देखने से पता चल जाता है की वजन बढ़ रहा है या घट रहा है। मेरे पास मशीन तो है नही इसलिए यही देख लेता हूँ।
मैं वहाँ से चल दिया पर मेरे दिमाग में बहुत सी बाते घूम रही थी। क्या मैंने इस बच्चे से सच कहा है?

आज से 2 हफ्ते पहले मैंने इस बच्चे को देखा था, इसकी उम्र 10 या 12 साल होगी। गंदी सी पेंट - शर्ट पहने। आगे एक वजन तोलने की मशीन रखी हुई है। जिस पर वजन तोलने के ये 2 रूपये लेता है।

मैंने जब भी इस बच्चे को देखता हूँ तो मुझे दुःख भी होता है और इस पर गर्व भी होता है। इतनी छोटी सी उम्र में अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। तब से पता नही मेरे मन में क्या आया और मैं रोज़ अपना वजन करने लगा। मैं रोज़ अपना वजन तौलता हूँ, इसे 2 रूपये देता हूँ और चला जाता हूँ।

जो बच्चे भीख मांगते है मुझे उन पर ना दया आती है और ना दुःख होता है। पर इस बच्चे को देख कर मुझे थोड़ा दुःख भी होता है पर उससे ज्यादा उस पर फक्र होता है। क्युंकि भीख मांगने वाले बच्चो में और इसमें एक बड़ा अंतर है। भीख मांगने वाले बच्चे अगर 100 से भीख मांगे तो उन्हें 1-- से मिल ही जाती है, 100 से मांगे तो 10-15 दे ही देते है और अगर 1000  से मांगते होंगे तो उन्हें 100 भी दे देते होंगे। पर इस बच्चे को दिन में कितने मिलते होंगे ? कितने लोग दिन में अपना वजन तौलते होंगे? ये भीख नहीं मांगता इसलिए पता नही इसके पास खाने के लिए भी पैसे हो पाते होंगे या नहीं।
मैं रोज अपना वजन तौलता हूँ और इसे 2 रूपये देता हूँ, इससे ना उसका कोई फायदा होता होगा और ना मेरा कोई नुकसान होता है। पर मैं सोचता हूँ कि अगर वहाँ से निकलने सभी व्यक्ति अपना वजन करके उसे 2 रूपये दें तो उसका महनत करने में और अधिक विश्वास बढ़ेगा। वरना हो सकता है वो भी भीख मांगने लगे। भीख मांगने वाले बच्चो की तादाद ज़्यादा है किन्तु महनत करके अपना पेट पालने वाले कम ही होते हैं, हमें ऐसे बच्चों को सहयोग करना चाहिए। जिससे उन्हें जीना के लिये एक अच्छा मार्ग मिल सके।

Sunday, April 19, 2015

हमने कांटों में


हमने कांटों में फूलों को खिलते देखा है
अच्छी बातों का भी मतलब बदलते देखा है
जो खाते थे कसम, हमेशा साथ निभाने की
हमने उन लोगों को भी बदलते देखा है
अब भी गुमां रखते हैं हम उसके लौट आने का
हमने पत्थर दिल को भी पिघलते देखा है
तुम भी तड़पोगे एक दिन हमारे लिए
हमने भी किस्मत को बदलते देखा है